उमरिया में मौत की बोतलों का खेल? बड़े ब्रांड के नाम पर मिलावटी शराब, आबकारी विभाग मौन!
रिपोर्ट--- आकाश नामदेव
उमरिया।
क्या उमरिया जिला मध्यप्रदेश के सागर और देवास जैसी जहरीली शराब त्रासदी को दोहराने का इंतजार कर रहा है? यह सवाल इसलिए क्योंकि जिले की लाइसेंसी शराब दुकानों में बड़े-बड़े ब्रांडों के नाम पर कथित तौर पर मिलावटी और संदिग्ध गुणवत्ता की शराब धड़ल्ले से बेचे जाने का गंभीर आरोप लग रहा है।
स्थानीय सूत्रों और उपभोक्ताओं की मानें तो बोतल पर चिपका लेबल तो बड़ा ब्रांड दिखाता है, लेकिन बोतल के अंदर का नशा और उसका असर कुछ और ही कहानी कह रहा है। सवाल बड़ा है - *क्या जनता की जेब के साथ-साथ उनकी जान से भी खिलवाड़ हो रहा है?*
*ब्रांडेड शराब भी नकली? सेहत पर सीधा वार*
यह खेल सिर्फ 10-20 रुपये की हेराफेरी का नहीं, सीधे जिंदगी और मौत का है। जहरीली या मिलावटी शराब का एक घूंट भी लीवर, किडनी ही नहीं, पूरे परिवार को खत्म कर सकता है। फिर भी आबकारी विभाग ने आज तक इन लाइसेंसी दुकानों की बोतलों का सील, बैच नंबर और लैब टेस्ट क्यों नहीं कराया? क्या विभाग को किसी बड़े हादसे का इंतजार है, तब जाकर उसकी नींद खुलेगी?
*छोटों पर डंडा, बड़ों को अभयदान?*
सबसे बड़ा खेल कार्रवाई के नाम पर चल रहा है। आरोप है कि जब प्रदेश में कहीं जहरीली शराब से मौतें होती हैं, तो उमरिया में दिखावे के लिए सड़क किनारे ठेले वाले, ढाबे वाले छोटे-मोटे विक्रेताओं को पकड़कर आंकड़े पूरे कर दिए जाते हैं।
*असली सवाल लाइसेंसी दुकानों पर है - उनका स्टॉक कहां से आता है? उनका रिकॉर्ड क्या कहता है? उनकी बोतलों की वैज्ञानिक जांच कब होगी?* अगर जांच करनी ही है तो सिर्फ गरीब के ठेले की क्यों, करोड़ों के टर्नओवर वाली दुकानों की क्यों नहीं?
*SDM-तहसीलदार ढाबे तक, आबकारी अफसर कहां?*
हैरानी की बात है कि अवैध शराब पकड़ने के लिए SDM, तहसीलदार तक सड़कों पर उतरते हैं, लेकिन जिनका यह मूल काम है, उस आबकारी विभाग की फील्ड में मौजूदगी और पारदर्शी कार्रवाई नदारद है। दुकानों पर औचक निरीक्षण, सैंपल कलेक्शन और पब्लिक रिपोर्ट कहां है?
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