कागजों में पल रहे मवेशी, दराजों में धूल फांक रही फाइलें, गौशाला के नाम पर सरकारी खजाने में सेंध!
रिपोर्ट--- आकाश नामदेव
शहडोल।
कहते हैं गाय में 33 करोड़ देवी-देवता बसते हैं, लेकिन शहडोल में गाय कागजों में बस रही है! हकीकत ये है कि जिले की गौशालाओं में भूसे के ढेर से ज्यादा फाइलों का ढेर है, और चारा खाने वाली गायों से ज्यादा कागजों में दौड़ने वाली गायें हैं।
जिला पंचायत के तेज-तर्रार CEO *शिवम प्रजापति* ने जिले की प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार की नब्ज पकड़ ली है। उन्होंने सोहागपुर, बुढार, गोहपारू, जयसिंहनगर और ब्यौहारी - सभी 5 जनपदों के CEO को फरमान जारी किया है - *हर महीने खुद जाकर गौशाला गिनो, एक-एक गाय का मिलान करो।*
आदेश साफ है - संचालक जो आंकड़ा दे रहा है, और डॉक्टर जो सर्टिफिकेट दे रहा है, क्या वो गायें सच में वहां हैं भी या सिर्फ कागजों में हरी घास खा रही हैं?
*आदेश निकलता है, फिर रद्दी की टोकरी में जाता है!*
यही तो शहडोल का सबसे बड़ा खेल है। जिला पंचायत से आदेश सख्त निकलता है, लेकिन जनपद में पहुंचते ही उसकी हवा निकल जाती है। बड़े साहब खुद कुर्सी से नहीं उठते। नीचे उपयंत्री, बाबू, सचिव को एक और चिट्ठी फॉरवर्ड कर देते हैं। जांच के नाम पर एक नई कमेटी, नया कागज और वही पुराना घोड़ा दौड़।
पहले भी निर्माण कार्यों की जांच के ऐसे ही कड़े आदेश निकले थे। नतीजा क्या हुआ? फाइलें आज भी दराजों में धूल फांक रही हैं और जिन पर भ्रष्टाचार का आरोप था, वो आज भी चैन की नींद सो रहे हैं।
*तो क्या गाय के नाम पर बजट डकारा जा रहा है?*
सीधा सवाल है - अगर जनपद के मुखिया खुद औचक निरीक्षण करने मैदान में नहीं उतरेंगे, तो सच कैसे सामने आएगा? चारे-भूसे, पानी-शेड के नाम पर जो लाखों का बजट आ रहा है, वो कहां जा रहा है? कागजों में 100 गायें और मौके पर 20 गायें - तो बाकी 80 गायों का पैसा किसकी जेब में?
CEO शिवम प्रजापति की मंशा बिल्कुल साफ है - व्यवस्था सुधारनी है। लेकिन जब तक इन लापरवाह, कामचोर और आदेशों को हवा में उड़ाने वाले अधिकारियों पर *तगड़ी अनुशासनिक कार्रवाई* नहीं होगी, तब तक ये कागजी गायें ऐसे ही सरकारी खजाने को चरती रहेंगी।
*अब देखना ये है कि ये आदेश भी सिर्फ फाइलों तक सीमित रहेगा या इस बार वाकई में किसी गौशाला का ताला खुलेगा और सच्ची गिनती होगी!*
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