1500 साल पुरानी प्रतिमा, दशहरे पर नहीं होता रावण दहन, पूजा-अर्चना कर मनाते हैं विजयादशमी
विदिशा के रावन गांव में घरों से लेकर वाहनों तक लिखे हैं ‘जय लंकेश’ के जयकारे, 12 फीट लंबी लेटी हुई प्रतिमा है आस्था का केंद्र
विदिशा।
देशभर में विजयादशमी पर रावण दहन की परंपरा है, लेकिन विदिशा जिले की नटेरन तहसील के रावन गांव में दशहरे का नजारा अलग होता है। यहां रावण का पुतला जलाने के बजाय रावण बाबा की पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिर में दीप प्रज्वलित किए जाते हैं, आरती होती है, रावण चालीसा का पाठ किया जाता है और भंडारे का आयोजन होता है। ग्रामीणों की मान्यता है कि रावण बाबा की पूजा से गांव में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
विदिशा जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव की पहचान रावण मंदिर और यहां की अनूठी परंपरा से है। गांव में घरों, दुकानों, वाहनों, पंचायत भवन और स्कूल तक पर ‘जय लंकेश’ और ‘जय रावण बाबा’ लिखा दिखाई देता है। ग्रामीण रावण को शक्ति और समृद्धि का प्रतीक मानते हैं।
12 फीट लंबी प्रतिमा, गुप्तकालीन होने का दावा
मंदिर में रावण की लेटी हुई प्रतिमा स्थापित है, जिसकी लंबाई करीब 12 फीट और चौड़ाई लगभग 3 फीट बताई जाती है। प्रतिमा के स्वरूप और शिल्पकला को लेकर इतिहासकार गोविंद देवलिया इसे गुप्तकालीन बताते हैं। उनके अनुसार, यह प्रतिमा करीब 1500 वर्ष पुरानी हो सकती है। प्रतिमा में चतुर्मुखी स्वरूप, हाथ में मृगछाल और हिरण की आकृति सहित शिल्प के कई विशिष्ट पहलू दिखाई देते हैं। इसके सिर के ऊपर नंदी की आकृति और पृष्ठभाग में ब्राह्मण स्वरूप होने की बात भी बताई जाती है।
कान्यकुब्ज ब्राह्मण मानते हैं आदि पुरुष
गांव में रहने वाले कई कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार रावण को अपना आदि पुरुष मानते हैं। उनकी मान्यता है कि रावण भी कान्यकुब्ज ब्राह्मण था। इसी विश्वास के चलते यहां रावण की पूजा की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि रावण दहन करना उनके लिए अशुभ माना जाता है, इसलिए विजयादशमी पर वे शोक की रस्में निभाने के साथ पूजा-अर्चना करते हैं।
प्रतिमा सीधी करने की कोशिश के बाद नहीं बदली परंपरा
ग्रामीणों के बीच यह मान्यता भी प्रचलित है कि जब कभी प्रतिमा को खड़ा करने का प्रयास किया गया, तब गांव में अनहोनी हुई। एक बार प्रतिमा को सीधा करने के प्रयास के बाद भीषण आग लगने की बात कही जाती है। इसके बाद से प्रतिमा को लेटी हुई अवस्था में ही पूजने की परंपरा कायम है। श्रद्धालु इसे आराम करती हुई रावण बाबा की प्रतिमा भी कहते हैं। यह प्रसंग स्थानीय मान्यता के रूप में प्रचलित है।
तालाब में गड़ी तलवार भी आकर्षण का केंद्र
मंदिर के सामने स्थित पुराने तालाब के बीच पत्थर की एक तलवार गड़ी होने की बात कही जाती है। ग्रामीण इसे रावण की तलवार मानते हैं। उनके अनुसार, इसका एक हिस्सा पानी के ऊपर दिखाई देता है। तालाब की मिट्टी और पानी को लेकर चर्म रोग ठीक होने जैसी मान्यताएं भी प्रचलित हैं, हालांकि इन दावों की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं है।
देश के कुछ स्थानों पर अलग है दशहरे की परंपरा
रावन गांव की तरह देश के कुछ अन्य स्थानों पर भी रावण दहन की जगह उनकी पूजा की परंपरा देखने को मिलती है। उत्तर प्रदेश के बिसरख में रावण को शिवभक्त और विद्वान मानकर पूजा जाता है, जबकि मंदसौर में रावण को मंदोदरी का मायका पक्ष से जुड़ा दामाद मानने की मान्यता प्रचलित है। मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले के देवरी गांव में भी आदिवासी समुदाय के लोग दशहरे पर रावण की पूजा करते हैं।
रावन गांव की विशेषता यह है कि यहां रावण से जुड़ी आस्था केवल मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी है। जहां अधिकांश स्थानों पर दशहरा रावण दहन के साथ मनाया जाता है, वहीं यहां ‘जय लंकेश’ के जयकारों के बीच पूजा-अर्चना कर विजयादशमी मनाई जाती है।
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