*संघ ने जिसे सबसे भ्रष्ट बताया, शिक्षा मंत्रालय ने उसे कुलपति चयन का मुखिया बना दिया*

Sep 27, 2026 - 22:42
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*संघ ने जिसे सबसे भ्रष्ट बताया, शिक्षा मंत्रालय ने उसे कुलपति चयन का मुखिया बना दिया*

रिपोर्ट--- आकाश नामदेव 

अनूपपुर। 

देश के विश्वविद्यालयों में कुलपति चयन समितियों की संरचना एक बार फिर सवालों के घेरे में है। 12 मई 2011 को नई दिल्ली में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने 'यूथ अगेंस्ट करप्शन' मंच की शुरुआत करते हुए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में देश के 25 कथित भ्रष्ट कुलपतियों की सूची जारी की थी। तत्कालीन राष्ट्रीय संगठन मंत्री सुनील आम्बेकर की उपस्थिति में यह सूची वरिष्ठ नेता विष्णु दत्त शर्मा ने जारी की थी, और सुनील बंसल को इस मंच का राष्ट्रीय संयोजक घोषित किया गया था। संगठन ने उस समय दावा किया था कि इन कुलपतियों की वित्तीय एवं प्रशासनिक अनियमितताओं से जुड़े दस्तावेज़ी प्रमाण उसके पास हैं। यह समाचार संघ समर्थित पत्रिका 'ऑर्गेनाइजर' में 29 मई 2011 को प्रकाशित हुआ था और आज भी ऑनलाइन उपलब्ध है। उस सूची में जो नाम दर्ज हैं, उनमें एक नाम प्रो. एन.सी. गौतम भी है।

*शिक्षा मंत्रालय ने सबसे भ्रष्ट को सैकड़ों विवि के कुलपति चयन में रखा है*

आज स्थिति यह है कि प्रो. एन.सी. गौतम, पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय, सतना (म.प्र.), शिक्षा मंत्रालय की 15 जून 2026 की नोटशीट के अनुसार इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक की कुलपति चयन समिति के सदस्य हैं। यह वही समिति है जिसने 20-21 अगस्त 2026 को आवेदनों की स्क्रूटनी कर एक दर्जन से अधिक नाम शॉर्टलिस्ट किए और जिसका इंटरेक्शन 29-30 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में प्रस्तावित है। प्रश्न सीधा है की जब एक बड़े छात्र संगठन ने सार्वजनिक रूप से, दस्तावेज़ों के दावे के साथ, किसी नाम को अपनी भ्रष्टाचार की सूची में रखा हो, तो क्या शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का यह दायित्व नहीं बनता था कि उस नाम को केंद्रीय विश्वविद्यालय की चयन समिति में रखने से पहले एक बार पृष्ठभूमि की जाँच कर लेते? जिन-जिन चयन समितियों में प्रो गौतम रहे, वहाँ लगभग एक जैसे प्रोफेसरों के नाम बार-बार शॉर्टलिस्ट होते रहे। गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय और डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर की चयन प्रक्रियाओं के संबंध में ऐसे ही दोहराव का उल्लेख शिकायतों में है। यह पैटर्न स्वतः जाँच की माँग करता है क्योंकि यदि 200 से 500 आवेदनों में से हर बार वही 40-50 नाम साक्षात्कार तक पहुँचते हैं, तो प्रश्न योग्यता का नहीं, चयन के मापदंडों की पारदर्शिता का बनता है। यही कारण है कि उच्च न्यायालय में भी पिछले 10 वर्षों की उन सभी चयन समितियों के अभिलेख माँगे हैं जिनमें ये नाम शामिल रहे। जब विज्ञापन सार्वजनिक होता है, नियुक्ति सार्वजनिक होती है लेकिन किस आधार पर, किन अंकों पर, किस मापदंड से सैकड़ों आवेदनों में से बीस-पच्चीस नाम छाँटे गए, यह कभी सार्वजनिक नहीं होता। न स्कोरिंग शीट, न कार्यवृत्त, न असफल अभ्यर्थियों को कोई कारण। 

*शिक्षा मंत्रालय के कई अधिकारी फँस सकते है कानूनी जाल में*

अब कानून की सीधी भाषा में स्पष्ट व्याख्या किया है की सर्वोच्च न्यायालय ने सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन बनाम भारत संघ, (2011) 4 एससीसी-1 में केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पी.जे. थॉमस की नियुक्ति रद्द करते हुए जो सिद्धांत दिया की उच्च पद पर "संस्थागत अखंडता" यानी संस्था की साख सर्वोपरि है; प्रतिकूल तथ्यों की अनदेखी करने वाली सिफारिश अवैध है और उस पर टिकी नियुक्ति गिर जाती है। यहाँ तो समिति में ही वह व्यक्ति बैठा है जिसे अपने ही अभिलेख 'फिक्सर' बताते हैं, ऐसी समिति की हर सिफारिश की साख शुरुवात से संदिग्ध है। दूसरा निर्णय और भी सीधा है की गंभीरदान के. गढ़वी बनाम गुजरात राज्य, (2022) 5 एससीसी-179 में सर्वोच्च न्यायालय ने सरल शब्दों में कहा कि यदि कुलपति खोज समिति का गठन ही कानून और यूजीसी विनियमों के अनुसार नहीं हुआ, तो उसकी सिफारिश पर बना कुलपति “वोयड एब इनिटियो” यानी शुरुवात से ही शून्य है और अदालत 'को वारंटो' रिट से सीधे पूछ सकती है कि "आप किस अधिकार से इस कुर्सी पर बैठे हैं?" इसी कड़ी में बाबू वर्गीस बनाम बार काउंसिल ऑफ केरल, (1999) 3 एससीसी-422 का चिर-स्थापित सूत्र है की "कानून ने जो काम जिस तरीके से करने को कहा है, वह उसी तरीके से होगा, वरना होगा ही नहीं।" अर्थात यदि आईजीएनटीयु की चयन समिति का गठन अधिनियम व नियमों की विहित रीति से नहीं हुआ है, तो विधि की नज़र में वह समिति, समिति है ही नहीं। कुलपति पद की स्क्रूटनी, उसकी शॉर्टलिस्ट, उसका इंटरेक्शन, सब कागज़ के महल हैं जो अदालत में भ्रष्टाचार और कुलपति फिक्सिंग साबित हो जाएँगे।

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